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करवा चौथ।

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आज फिर करवा चौथ आया।  फिर दिल में एक उभार लाया।। मेरी वह चाँदनी नहीं बन पायी।  मैं उसका चाँद नहीं बन पाया।।  आज फिर करवा चौथ आया।  फिर दिल में एक उभार लाया।।  उसका मुखड़ा इन आँखों में उतर आया।  यह देख चाँद बहुत इतराया।।  आज फिर करवा चौथ आया।  फिर दिल में एक उभार लाया।।  यादें फिर उसकी याद आयीं।  जुल्फें लहराते वह नज़र आयी।। सिसकियाँ सिसक कर आयीं।   बिन मौसम फिर बारिश आयी।। फिर वह कानपुर की गलियां याद आयीं। बनारस की गर्मियाँ भी बहुत भायीं।। कुछ पल का सपना हकीकत नज़र आया।  यह देखने चाँद भी जमीं पर उतर आया।।  आज फिर करवा चौथ आया।  फिर दिल में एक उभार लाया।।                          . . . शुभम सिंह      

छा गयी है तू मुझमे।

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छा गयी है तू मुझमे,  महक गयी है तू मुझमे,  चांदनी बन गयी है तू मुझमे,  बस इंतज़ार है समा जा तू मुझमे।  मुस्कराहट बन गयी है तू मुझमे,  रिमझिम सावन बन गयी है तू मुझमे,  एक गीत सी बन गयी है तू मुझमे,  बस एक आदत सी बन गयी है तू मुझमे।  सागर की गहराई जैसे उतर आयी है तू मुझमे,  बहता दरिया सा ख्वाब बन आयी है तू मुझमे,  ब्रह्माण्ड जैसा बिस्तार बन आयी है तू मुझमे,  समुद्र मंथन का अमृतमयी कलश बन आयी है तू मुझमे।  प्रेम का बिगुल बजा आयी है तू मुझमे,  गुलाब के फूल जैसे खिल आयी है तू मुझमे,  इस कदर उतर आयी है तू मुझमे,  जैसे खुदा ही उतर आया हो मुझमे।                            . . . शुभम सिंह 

छोटू का संघर्ष।

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उम्र  ना थी  कुछ  भी  उसकी,  फिर भी  वह काम   किये जा रहा था,  वह खुद पर  तरस  खा  रहा था, पर जमाना  उससे काम  लिए जा  रहा था।   खेलने की  उम्र में  जिम्मेदारियाँ  निभा  रहा था,  बचपन की  उम्र में  दुकान पे  छोटू कहला  रहा था, उम्र ना  थी कुछ  भी  उसकी, फिर भी  वह काम  किये जा  रहा था। हर  कोई  उसे छोटू  बुला रहा था, सबकी वह  बस सुने  जा रहा था, पर उसकी  वेदना कोई  दूर नहीं  कर  रहा था,  वह सिर्फ  मुस्करा के  काम किये   जा रहा था। उम्र ना  थी कुछ  भी  उसकी।  फिर भी  वह काम  किये जा  रहा था।। अपने परिवार  का बोझ  उठा  रहा था,  अमीरी को  आईना  दिखा  रहा था,  गरीबी में  वह अपनी  अमीरी  दिखा रहा था,  अपने परिवार  का खेवईया  कहला   रहा था।  उम्र ना  थी कुछ  भी  उसकी।  फिर भी  वह काम   किये जा  रहा था।। सिसकियाँ  उसकी कौन  सुन  रहा था, आंसू  उसके  कौन  पोछ  रहा था,  प्यार  उससे  कौन कर  रहा था,  बस खुद  के काम के  वास्ते हर  कोई  छोटू  कह  रहा था । उम्र  ना  थी  कुछ  भी  उसकी।  फिर भी  वह  काम  किये  जा  रहा 

एक शायरी उन पर ।

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हमारी चाहत चहकने लगी,  उनकी जुल्फें बिखरने लगीं, और मोहब्बत परवान चढ़ने लगी, मानो जैसे इश्क़ की बरसात होने लगी ।                                                                                   . . .  शुभम सिंह     

शायरी ।

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तुम्हारी चाल,  तुम्हारी अदा,  तुम्हारी  बोली,  तुम्हारी नयनकटारी, क्या क्या वर्णन  मैं और करूँ  मोतरमा, यह हैं तुम्हारे सारे अपने  खंजर,   जो पल भर में  कर देते हैं  मेरे दिल  को पलंजर ।                                                                                                       . . .  शुभम सिंह 

गीत ...

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बदली उमड़ - उमड़ बरसे, बिजली गरज - गरज  गरजे,  मन मेरा बहक - बहक बहके,  पिया मिलन  - मिलन को जी तरसे ।   पिया हैं दूर - दूर कबसे, पिया हैं अकेले - अकेले कबसे, मन मेरा तड़प - तड़प  तड़पे,  पिया मिलन  - मिलन को जी तरसे ।   पिया करें हैं वादा - वादा हमसे,  वादा है आज ही मिलेंगे - मिलेंगे हमसे,  मन मेरा पिया दर्शन - दर्शन को तरसे, पिया मिलन  - मिलन को जी तरसे ।   पिया खबरिया आयेगी - आयेगी कबसे, पिया बिना जिया मेरा उमड़ - उमड़ उमड़े,  मन मेरा बहक -बहक बहके,  पिया मिलन  - मिलन को जी तरसे ।                                                                       . . .  शुभम सिंह   

तुम्हारी जुल्फें।

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तुम्हारी घुघराली जुल्फें  सवारना  चाहता  हूँ, तुम्हारी नयन कटारी से घायल  होना  चाहता  हूँ,  तुम्हारे हर हुक्म की गुलामी  करना  चाहता हूँ,  सीधे कहूँ तो यार तुम पर मर  ही जाना  चाहता  हूँ ।                                                                                                       . . .   शुभम सिंह